ऊष्मागतिकी का शून्यवाँ नियम (Zeroth Law of Thermodynamics )
परिभाषा :
यदि दो निकाय किसी तीसरे निकाय के साथ अलग-अलग ऊष्मीय (तापीय) संतुलन में हों, तो वे दोनों निकाय आपस में भी ऊष्मीय संतुलन में होते हैं। इस नियम का प्रतिपादन 1931 में आर. एच. फाउलर द्वारा किया गया।
प्रयोग द्वारा व्याख्या :
माना तीन प्रणालियाँ A, B और C हैं जिनके तापक्रम क्रमशः $T_a$, $T_b$ और $T_c$ हैं।
पहले प्रणाली A और C को Diathermic wall के संपर्क में लाया जाता है।कुछ समय बाद ऊष्मा का प्रवाह रुक जाता है, अतः
$T_A = T_C$
इसके बाद प्रणाली B और C को भी Diathermic wall के संपर्क में लाया जाता है।तापीय साम्य प्राप्त होने पर
$T_B = T_C$
अब A और B को Adiabatic wall से अलग कर दिया जाता है ताकि उनके बीच ऊष्मा का आदान-प्रदान न हो। चूँकि
$T_A= T_C$ और $T_B = T_C$ अत: $T_A= T_B$
इस प्रकार यदि दो प्रणालियाँ किसी तीसरी प्रणाली के साथ अलग-अलग तापीय साम्य
में हों, तो वे आपस में भी तापीय साम्य में होंगी। यही ऊष्मागतिकी का
शून्यवाँ नियम कहलाता है।
निष्कर्ष :
इस प्रयोग से यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि दो निकाय किसी तीसरे निकाय के साथ ऊष्मीय संतुलन में हों, तो वे आपस में भी ऊष्मीय संतुलन में होंगे। यही ऊष्मागतिकी का शून्यवाँ नियम कहलाता है।
ताप की अवधारणा :
ऊष्मीय संतुलन की अवस्था में सभी वस्तुओं में एक सामान्य गुण पाया जाता है, जो सभी के लिए समान होता है। इस सामान्य गुण को ताप कहा जाता है। इस प्रकार ऊष्मागतिकी का शून्यवाँ नियम ताप की वैज्ञानिक परिभाषा प्रदान करता है।