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Showing posts from February, 2025

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स्वागत गीत : अथ स्वागतम् शुभ स्वागतम् (Ath Swagatam Shubh Swagatam)

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स्वागत गीत : अथ स्वागतम् शुभ स्वागतम् (Ath Swagatam Shubh Swagatam)  अथ स्वागतं शुभ स्वागतम्  स्वागतम् । अथ स्वागतं शुभ स्वागतम् । आनंद मंगल मंगलम् । नित प्रियं भारत भारतम् ॥ ध्रु.॥ नित्य निरंतरता नवता मानवता समता ममता सारथि साथ मनोरथ का जो अनिवार नहीं थमता संकल्प अविजित अभिमतम् ॥ १॥ आनंद मंगल मंगलम् । नित प्रियं भारत भारतम् । अथ स्वागतं शुभ स्वागतम् ॥ कुसुमित नई कामनाएँ सुरभित नई साधनाएँ मैत्रीमात क्रीडांगन में प्रमुदित बन्धु भावनाएँ शाश्वत सुविकसित इति शुभम् ॥ २॥ आनंद मंगल मंगलम् । नित प्रियं भारत भारतम् । अथ स्वागतं शुभ स्वागतम् ॥

कविता : रोते-रोते रात सो गई Rote Rote Raat So Gayi अटल बिहारी वाजपेयी Atal Bihari Vajpayee

कविता : रोते-रोते रात सो गई Rote Rote Raat So Gayi अटल बिहारी वाजपेयी Atal Bihari Vajpayee  यह कविता अटल बिहारी वाजपेयी जी द्वारा लिखी गई है। इस कविता में, कवि ने एक रात की पीड़ा और विरह का वर्णन किया है। रोते-रोते रात सो गई झुकी न अलकें झपी न पलकें सुधियों की बारात खो गई दर्द पुराना मीत न जाना बातों ही में प्रात हो गई घुमड़ी बदली बूँद न निकली बिछुड़न ऐसी व्यथा बो गई रोते-रोते रात सो गई कविता का भावार्थ इस प्रकार है:  * रोते-रोते रात सो गई, झुकी न अलकें, झपी न पलकें, सुधियों की बारात खो गई: इन पंक्तियों में, कवि कहते हैं कि रात रोते-रोते बीत गई, लेकिन आँखों से नींद गायब थी। यादों की बारात खो गई, यानी पुरानी यादें मन में उलझ गईं।  * दर्द पुराना, मीत न जाना, बातों ही में प्रात हो गई: इन पंक्तियों में, कवि पुराने दर्द की बात करते हैं, जो उनके साथी को भी नहीं पता। पूरी रात बातों में ही बीत गई और सुबह हो गई।  * घुमड़ी बदली, बूँद न निकली, बिछुड़न ऐसी व्यथा बो गई: इन पंक्तियों में, कवि कहते हैं कि बादल घिरे, लेकिन बारिश नहीं हुई। यह बिछुड़न ऐसी पीड़ा दे गई, जो मन में गहरी व्य...

कविता : न मैं चुप हूँ न गाता हूँ , Na me chup hu Na gata hu अटल बिहारी वाजपेयी Atal Bihari Vajpayee Poem

कविता : न मैं चुप हूँ न गाता हूँ , Na me chup hu Na gata hu अटल बिहारी वाजपेयी Atal Bihari Vajpayee Poem यह कविता अटल बिहारी वाजपेयी जी द्वारा लिखी गई है। इस कविता में, कवि ने जीवन में आने वाली अनिश्चितताओं और आंतरिक द्वंद्वों का वर्णन किया है। उन्होंने एक ऐसे समय का चित्रण किया है जब आशा और निराशा, गति और जड़ता, सुख और दुख एक साथ मौजूद हैं। सवेरा है मगर पूरब दिशा में घिर रहे बादल, रूई से धुँधलके में मील के पत्थर पड़े घायल। ठिठके पाँव, ओझल गाँव, जड़ता है न गतिमयता, स्वयं को दूसरों की दृष्टि से मैं देख पाता हूँ। न मैं चुप हूँ न गाता हूँ, समय की सर्द साँसों ने चिनारों को झुलस डाला। मगर हिमपात को देती चुनौती एक द्रुममाला, बिखरे नीड़, विहँसी चीड़, आँसू हैं न मुस्कानें, हिमानी झील के तट पर अकेला गुनगुनाता हूँ, न मैं चुप हूँ न गाता हूँ। भावार्थ :  कविता का भावार्थ इस प्रकार है:  * सवेरा है मगर पूरब दिशा में घिर रहे बादल, रूई से धुँधलके में मील के पत्थर पड़े घायल: इन पंक्तियों में, कवि ने एक ऐसे समय का वर्णन किया है जब आशा की किरणें तो दिखाई दे रही हैं, लेकिन निराशा के बादल भी मंडर...

आओ फिर से दिया जलाएँ ( Aao Fir Se Diye Jalaye ) - अटल बिहारी वाजपेयी Atal bihari vajpayee

भावार्थ - आओ फिर से दिया जलाएँ ( Aao Fir Se Diye Jalaye ) - अटल बिहारी वाजपेयी Atal bihari vajpayee  यह कविता अटल बिहारी वाजपेयी जी द्वारा लिखी गई है। इस कविता में, कवि ने जीवन में आने वाली कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करने की प्रेरणा दी है। उन्होंने कहा है कि हमें कभी भी हार नहीं माननी चाहिए और हमेशा अपने लक्ष्यों की ओर अग्रसर रहना चाहिए। आओ फिर से दिया जलाएँ भरी दुपहरी में अँधियारा सूरज परछाईं से हारा अंतरतम का नेह निचोड़ें, बुझी हुई बाती सुलगाएँ आओ फिर से दिया जलाएँ हम पड़ाव को समझे मंज़िल लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल वतर्मान के मोहजाल में आने वाला कल न भुलाएँ आओ फिर से दिया जलाएँ आहुति बाक़ी यज्ञ अधूरा अपनों के विघ्नों ने घेरा अंतिम जय का वज्र बनाने नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ आओ फिर से दिया जलाएँ यह कविता अटल बिहारी वाजपेयी जी द्वारा लिखी गई है। इस कविता में, कवि ने जीवन में आने वाली कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करने की प्रेरणा दी है। उन्होंने कहा है कि हमें कभी भी हार नहीं माननी चाहिए और हमेशा अपने लक्ष्यों की ओर अग्रसर रहना चाहिए। कविता का भावार्थ इस प्रकार है:  * भरी दुपहर...

मौत से ठन गई ( maut se than gyi )- अटल बिहारी वाजपाई Atal bihari vajpayee कविता poem

भावार्थ - मौत से ठन गई ( maut se than gyi )- अटल बिहारी वाजपाई Atal bihari vajpayee कविता poem यह कविता जीवन के प्रति अटल जी के अदम्य साहस और सकारात्मक दृष्टिकोण को दर्शाती है। यह मृत्यु के भय पर विजय और जीवन की चुनौतियों का डटकर सामना करने की प्रेरणा देती है। मौत से ठन गई! जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा ज़िंदगी से बड़ी हो गई मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, ज़िंदगी-सिलसिला, आज-कल की नहीं मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ? तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ, सामने वार कर फिर मुझे आज़मा मौत से बेख़बर, ज़िंदगी का सफ़र, शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं, दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं प्यार इतना परायों से मुझको मिला, न अपनों से बाक़ी है कोई गिला हर चुनौती से दो हाथ मैंने किए, आँधियों में जलाए हैं बुझते दिए आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है, नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है पार पाने का क़ायम मगर हौसला, देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई, मौत से ठन गई। भावार्थ: यह कविता जीवन के प्रति ...

गीत नया गाता हूँ ( Geet Naya Gaata hu ) - अटल बिहारी वाजपेयी की प्रसिद्ध कविता

शीर्षक: गीत नया गाता हूँ ( Geet naya gaata hu ) - अटल बिहारी वाजपेयी Atal bihari vajpayee की प्रसिद्ध कविता Poem| आशा और प्रेरण विवरण: अटल बिहारी वाजपेयी की प्रसिद्ध कविता "गीत नया गाता हूँ" पढ़िए। यह कविता निराशा से आशा की ओर ले जाती है और जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण रखने की प्रेरणा देती है। कविता: टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर, पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर, झरे सब पीले पात, कोयल की कूक रात, प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूँ। गीत नया गाता हूँ। टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी? अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी। हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा, काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ। गीत नया गाता हूँ। गिरिजा के गौरव का गाकर भग्न कहानी, थर-थर काँपी जवानी, सुनी हमने यह जानी। युग के सिंहासन पर अपनी जय के सपने, अवरोधों की शृंखला हम न कभी गिनते हैं। गीत नया गाता हूँ। बाधाएँ क्या पथ रोकेंगी, क्या विपदाएँ भयभीत करेंगी? क्या आँधियाँ रोकेंगी, क्या ज्वालाएँ भयभीत करेंगी? निज हाथों में हँसते-हँसते, आग लगाकर जलना होगा, कदम मिलाकर चलना होगा। गीत नया गाता हूँ। कविता का भावार्थ: ...

सपना टूट गया Sapna tut gya - अटल बिहारी वाजपेयी कविता - Param Himalaya

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सपना टूट गया Sapna tut gya - अटल बिहारी वाजपेयी कविता Atal bihari Vajpayee  Poem- Param Himalaya  "सपना टूट गया" अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक प्रसिद्ध कविता है जो उनके गहरे विचारों और भावनाओं को दर्शाती है। यह कविता निराशा, आशा और जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण को व्यक्त करती है। कविता के बोल: हाथों की हल्दी है पीली, पैरों की मेहंदी कुछ गीली, पलक झपकने से पहले ही, सपना टूट गया। दीप बुझाया रची दीवाली, लेकिन कटी न मावस काली, व्यर्थ हुआ आवाहन, स्वर्ण सबेरा रूठ गया, सपना टूट गया। नियति नटी की लीला न्यारी, सब कुछ स्वाहा की तैयारी, अभी चला दो कदम कारवाँ, साथी छूट गया, सपना टूट गया। कविता का भावार्थ: यह कविता जीवन की क्षणभंगुरता और अनिश्चितता को दर्शाती है। वाजपेयी जी ने इसमें जीवन के उतार-चढ़ाव, आशा-निराशा और सपनों के टूटने का वर्णन किया है।  * सपनों का टूटना: कविता में सपनों के टूटने का जिक्र है, जो जीवन में आने वाली निराशाओं का प्रतीक है।  * जीवन की अनिश्चितता: यह कविता जीवन की अनिश्चितता और क्षणभंगुरता को भी दर्शाती है।  * आशा और निराशा: कविता में आशा और निराशा दोनों ...

Lyrics with MP3 : चन्दन है इस देश की माटी , Chandan Hai Is Desh Ki Mati -

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चंदन है इस देश की माटी Chandan Hai Is Desh Ki Mati" एक प्रसिद्ध देशभक्ति गीत है जो भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को दर्शाता है चन्दन है इस देश की माटी, तपोभूमि हर ग्राम है। हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा-बच्चा राम है॥ हर शरीर मन्दिर सा पावन, हर मानव उपकारी है। जहाँ सिंह बन गये खिलौने, गाय जहाँ माँ प्यारी है। जहाँ सवेरा शंख बजाता, लोरी गाती शाम है। हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा-बच्चा राम है॥ जहाँ कर्म से भाग्य बदलते, श्रम निष्ठा कल्याणी है। त्याग और तप की गाथाएँ, गाती कवि की वाणी है॥ ज्ञान जहाँ का गंगा जल सा, निर्मल है अविराम है। हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा-बच्चा राम है॥ जिसके सैनिक समर भूमि में, गाया करते गीता हैं। जहाँ खेत में हल के नीचे, खेला करती सीता हैं। जीवन का आदर्श यहाँ पर, परमेश्वर का धाम है। हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा-बच्चा राम है ॥ चन्दन है इस देश की माटी, तपोभूमि हर ग्राम है। हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा-बच्चा राम है ॥ शीर्षक: चंदन है इस देश की माटी  * प्रकार: देशभक्ति गीत  * विषय: भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत, देशभक्ति, नैतिक मूल्य।...

Welcome song स्वागत गीत - अथ स्वागतम् शुभ स्वागतम् Atha Swagatam Shubha Swagatam - Param Himalaya

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Atha Swagatam Shubha Swagatam अथ स्वागतम् शुभ स्वागतम् Swagatam Shubh Swagatam, written by Pt. Narendra Sharma and composed by Pt. Ravishankar. This song was first sung at Asiad 1982 opening ceremony in Delhi, India स्वागतम् । अथ स्वागतं शुभ स्वागतम् । आनंद मंगल मंगलम् । नित प्रियं भारत भारतम् ॥ ध्रु.॥ नित्य निरंतरता नवता मानवता समता ममता सारथि साथ मनोरथ का जो अनिवार नहीं थमता संकल्प अविजित अभिमतम् ॥ १॥ आनंद मंगल मंगलम् । नित प्रियं भारत भारतम् । अथ स्वागतं शुभ स्वागतम् ॥ कुसुमित नई कामनाएँ सुरभित नई साधनाएँ मैत्रीमात क्रीडांगन में प्रमुदित बन्धु भावनाएँ शाश्वत सुविकसित इति शुभम् ॥ २॥ आनंद मंगल मंगलम् । नित प्रियं भारत भारतम् । अथ स्वागतं शुभ स्वागतम् ॥

Lyrics : वो दिन भी क्या दिन थे , Woh din bhi kya din the - Farewell & Friendship Song - hindi English Param Himalaya

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वो दिन भी क्या दिन थे | Woh Din Bhi Kya Din The | Farewell & Friendship Song | Param Himalaya | Hindi यादों के पुराने एल्बम में छुपा के रखे हैं हमने वो दिन  हम्म.. गुल्लक में पड़ी चवन्नी सी  बचा के रखे हैं हमने वो दिन  ना किसी मंजिल की फिकर थी  ज़िन्दगी जीने की उम्र थी  दोस्ती और दोस्तों से उधार के दिन थे  (वो दिन भी क्या दिन थे वो ओ वो.. ) x 4  बिगड़े हुए इंसान थे शैतान की संतान थे  हो.. लेकिन brother जो भी कहो  वो यार ही तो जान थे  कॉलेज की कुड़ी से  करने आँखें चार के दिन थे  आये ज़िन्दगी में पहले पहले  प्यार के दिन थे हेय..  वो दिन भी क्या दिन थे  वो ओ वो..  वो दिन भी क्या दिन थे  वो ओ वो..  वो दिन भी क्या दिन थे  ऊ..  करना मना थे काम जो  हमने किया हर काम वो  हम्म.. जिनकी नहीं थी परमिशन  सारे किये इंतेज़ाम वो  बेढ़ब हरक़तों के  भूत सर पे सवार के दिन थे  हद करने के यारों  आर या फिर पार के दिन थे  वो दिन भी क्या दिन थे वो ओ वो..  वो दिन भी क्या दि...