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स्वागत गीत : अथ स्वागतम् शुभ स्वागतम् (Ath Swagatam Shubh Swagatam)

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स्वागत गीत : अथ स्वागतम् शुभ स्वागतम् (Ath Swagatam Shubh Swagatam)  अथ स्वागतं शुभ स्वागतम्  स्वागतम् । अथ स्वागतं शुभ स्वागतम् । आनंद मंगल मंगलम् । नित प्रियं भारत भारतम् ॥ ध्रु.॥ नित्य निरंतरता नवता मानवता समता ममता सारथि साथ मनोरथ का जो अनिवार नहीं थमता संकल्प अविजित अभिमतम् ॥ १॥ आनंद मंगल मंगलम् । नित प्रियं भारत भारतम् । अथ स्वागतं शुभ स्वागतम् ॥ कुसुमित नई कामनाएँ सुरभित नई साधनाएँ मैत्रीमात क्रीडांगन में प्रमुदित बन्धु भावनाएँ शाश्वत सुविकसित इति शुभम् ॥ २॥ आनंद मंगल मंगलम् । नित प्रियं भारत भारतम् । अथ स्वागतं शुभ स्वागतम् ॥

Frame of Reference (FOR) : Inertial and Non-Inertial (NFOR)

Frame of Reference (FOR) : Inertial and Non-Inertial (NFOR) 1. Frame of Reference (FOR) A frame of reference is a coordinate system along with a clock, relative to which the position, velocity, and acceleration of a particle are measured. Position vector of a particle: \[ \vec{r}(t) = x(t)\hat{i} + y(t)\hat{j} + z(t)\hat{k} \] Without a frame of reference, the concepts of rest and motion have no meaning. Hence, motion is always relative . 2. Relative Motion (Important) Relative position: \[ \vec{r}_{AB} = \vec{r}_A - \vec{r}_B \] Relative velocity: \[ \vec{v}_{AB} = \vec{v}_A - \vec{v}_B \] Relative acceleration: \[ \vec{a}_{AB} = \vec{a}_A - \vec{a}_B \] Velocity and position depend on the frame of reference, while acceleration is invariant between inertial frames. 3. Inertial Frame of Reference (IFOR) An inertial frame of reference is one in which a body remains at rest or moves with uniform velocity in a straight line unless acted upon by ...

प्रकाश का कणीय प्रकृति : फोटॉन के व्यवहार

प्रकाश का कणीय प्रकृति : फोटॉन के व्यवहार  1. प्रकाश का कण – फोटॉन प्रकाश का बहुत छोटा कण होता है, जो तरंग की तरह नहीं, बल्कि कण की तरह व्यवहार करता है। 2. ऊर्जा तय होती है – प्रत्येक फोटॉन की ऊर्जा निश्चित होती है और यह E = hν से दी जाती है (ν = आवृत्ति)। 3. संवेग होता है – फोटॉन में ऊर्जा के साथ-साथ संवेग भी होता है, जो p = hν/c होता है। 4. गति हमेशा c – फोटॉन हमेशा प्रकाश की गति c = 3×10⁸ m/s से चलते हैं। 5. द्रव्यमान शून्य – फोटॉन का विश्राम द्रव्यमान (rest mass) शून्य होता है। इसलिए यह केवल चलते समय ऊर्जा रखता है। 6. आवृत्ति बदलने से ऊर्जा बदलती है – अगर प्रकाश की आवृत्ति बढ़ेगी तो एक-एक फोटॉन की ऊर्जा भी बढ़ेगी। 7. तीव्रता बदलने से संख्या बदलती है – प्रकाश की तीव्रता बढ़ाने पर फोटॉनों की संख्या बढ़ती है, ऊर्जा नहीं। 8. विद्युत/चुंबकीय क्षेत्र से प्रभावित नहीं – फोटॉन पर कोई आवेश नहीं होता, इसलिए ये किसी विद्युत या चुंबकीय क्षेत्र से नहीं मुड़ते। 9. अवशोषित या उत्सर्जित हो सकते हैं – फोटॉन पदार्थ से टकराकर अवशोषित, उत्सर्जित या परावर्तित हो सकते हैं। 10. तरंग और कण दोनों गुण र...

डी ब्रॉग्ली परिकल्पना को स्पष्ट कीजिए। ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य का सूत्र व्युत्पन्न कीजिए और इसकी विशेषताएँ बताइए।

Question: डी ब्रॉग्ली परिकल्पना को स्पष्ट कीजिए। ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य का सूत्र व्युत्पन्न कीजिए और इसकी विशेषताएँ बताइए। Answer :  ब्रॉग्ली की धारणा: लुईस डी ब्रॉग्ली ने यह प्रस्तावित किया कि किसी भी चल रहे कण (जैसे इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, आदि) के साथ तरंग की प्रकृति जुड़ी होती है। इसका मतलब है कि सभी कणों का द्रव्य गति के साथ एक तरंगदैर्ध्य (wavelength) जुड़ा होता है। ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य का सूत्र: $\lambda = \frac{h}{p}$ जहाँ, $\lambda$= ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य, h= प्लांक स्थिरांक, p = कण का द्रव्य संवेग (momentum), = mv। इस प्रकार, ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य द्रव्य संवेग के व्युत्क्रमानुपाती होती है। $\lambda = \frac{h}{mv}$ संक्षेप में संबंध: 1. किसी कण का द्रव्य संवेग जितना अधिक होगा, उसका ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य उतना छोटा होगा। 2. ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य केवल माइक्रोस्कोपिक कणों (जैसे इलेक्ट्रॉन) के लिए महत्वपूर्ण होती है, मैक्रोस्कोपिक वस्तुओं के लिए अत्यंत लघु होती है और अनुभव नहीं की जा सकती।

इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन को परिभाषित करें और इसके विभिन्न प्रकारों को बताइए। Electron Emission - Class 12 Physics

प्रश्न : इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन को परिभाषित करें और इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन के विभिन्न प्रकारों को बताइए। परिभाषा: धातु की सतह से बाहरी ऊर्जा प्रदान कर इलेक्ट्रॉन के उत्सर्जन की घटना को इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन कहा जाता है। स्पष्टीकरण: धातुओं में, परमाणु के बाहरी कक्ष के इलेक्ट्रॉन ढीले बंधे होते हैं और सामान्य तापमान पर भी वे धातु के भीतर सभी संभावित दिशाओं में स्वतंत्र रूप से गति कर सकते हैं। इन इलेक्ट्रॉनों को मुक्त इलेक्ट्रॉन कहा जाता है। ये मुक्त इलेक्ट्रॉन ही धातु की विद्युत चालकता के लिए जिम्मेदार होते हैं। हालाँकि, ये मुक्त इलेक्ट्रॉन अपने आप धातु की सतह को नहीं छोड़ सकते। जैसे ही कोई इलेक्ट्रॉन धातु की सतह छोड़ने की कोशिश करता है, सतह पर एक धनात्मक आवेश उत्पन्न हो जाता है जो इस इलेक्ट्रॉन को वापस आकर्षित करने लगता है। यह आकर्षण बल सतह बाधा के रूप में कार्य करता है। कोई मुक्त इलेक्ट्रॉन तभी सतह को छोड़ सकता है जब उसे सतह बाधा को पार करने के लिए पर्याप्त बाहरी ऊर्जा प्रदान की जाए। इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन के प्रकार: धातु की सतह से इलेक्ट्रॉन को उत्सर्जित करने के लिए आवश्यक बाहरी ऊर्जा विभिन्न तर...

Full Explain: शुद्ध अथवा निज अर्धचालक (Intrinsic Semiconductor) ,

शुद्ध अथवा निज अर्धचालक (Intrinsic Semiconductor) परिभाषा: जिस अर्धचालक में किसी प्रकार की अशुद्धि (impurity) नहीं मिलाई जाती और जो पूर्णत: शुद्ध अवस्था में होता है, उसे शुद्ध अथवा निज (Intrinsic) अर्धचालक कहते हैं। उदाहरण: सिलिकॉन (Si- z=14) और जर्मेनियम (Ge- z=32) विशेषताएँ: 1. इसमें कोई अशुद्धि नहीं होती। 2. सिलिकॉन व जर्मेनियम के बाहरी कक्ष में 4 इलेक्ट्रॉन होते हैं, जो पास–पास के परमाणुओं से सहसंयोजक (covalent) बंध बनाते हैं। 3. 0 K (शून्य केल्विन) पर यह पूर्णत: कुचालक (insulator) होता है। 4. जब तापमान बढ़ाया जाता है तो ऊष्मीय विक्षोभ (thermal agitation) के कारण कुछ सहसंयोजक बंध टूट जाते हैं। इलेक्ट्रॉन वैलेन्स बैंड से conduction band में चला जाता है। पीछे छोड़ा गया स्थान होल (hole) कहलाता है। इस प्रकार इलेक्ट्रॉन–होल जोड़े (electron–hole pairs) उत्पन्न होते हैं। 5. अर्धचालक की चालकता इलेक्ट्रॉनों और होल्स दोनों से होती है और दोनों की संख्या बराबर रहती है।  $n_{e} = n_{h} = n_{i}$ जहां $n_{i}$ =  6. तापमान जितना बढ़ेगा, उतनी अधिक संख्या में इलेक्ट्रॉन–होल जोड़े बनेंगे और ...

Full Explain : अशुद्ध अथवा बाह्य अर्धचालक - दो प्रकार n - टाइप एवं p - टाइप अर्धचालक

अशुद्ध अथवा बाह्य अर्धचालक (Extrinsic Semiconductors) :  निज (शुद्ध) अर्धचालकों की वैद्युत चालकता अति अल्प होती है परन्तु यदि किसी ऐसे पदार्थ की थोड़ी-सी मात्रा, जिसकी संयोजकता (valency) 5 अथवा 3 हो, शुद्ध जर्मेनियम (अथवा शुद्ध सिलिकॉन) क्रिस्टल में अपद्रव्य (impurity) के रूप में मिश्रित कर दें तो क्रिस्टल की चालकता काफ़ी बढ़ जाती है। मिश्रित करने की क्रिया को 'अपमिश्रण (doping)' कहते हैं। उदाहरणार्थ, $10^8$ जर्मेनियम परमाणुओं में 1 अपद्रव्य परमाणु मिश्रित कर देने पर, जर्मेनियम की चालकता 16 गुना तक बढ़ जाती है। ऐसे अशुद्ध अर्धचालकों को 'बाह्य (extrinsic) अथवा 'अपद्रव्य (impurity) अथवा अपमिश्रित (doped) अर्धचालक कहते हैं। इन अर्धचालकों में मिश्रित किये जाने वाले अपद्रव्य की मात्रा को नियन्त्रित करके इच्छानुसार चालकता अर्जित की जा सकती है। बाह्य अर्धचालक दो प्रकार के होते हैं: n-टाइप तथा p-टाइप (a) n-टाइप अर्धचालक (n-type Semiconductor): जब किसी जर्मेनियम (अथवा सिलिकॉन) क्रिस्टल में संयोजकता 5 वाला (pentavalent) अपद्रव्य परमाणु (जैसे आर्सेनिक, ऐण्टीमनी अथवा फॉस्फोरस) मिश्...

धातुओं, चालक तथा अर्धचालकों का वर्गीकरण : चालकता ,प्रतिरोधकता व ऊर्जा बैंड आरेख आधार पर Classification of Metals, Insulators and Semiconductors on the Basis of Conductivity, Resistivity and Energy Band Diagram)

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अध्याय – 14 : अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिक्स : सामग्री, युक्तियाँ एवं सरल परिपथ धातुओं, चालक तथा अर्धचालकों का वर्गीकरण : चालकता ,प्रतिरोधकता व ऊर्जा बैंड आरेख आधार पर Classification of Metals, Insulators and Semiconductors on the Basis of Conductivity, Resistivity and Energy Band Diagram) धातुओं, चालक तथा अर्धचालकों का वर्गीकरण : चालकता या प्रतिरोधकता के आधार पर : विद्युत चालकता ($\sigma$) या प्रतिरोधकता  $\left( \rho = \dfrac{1}{\sigma} \right)$  के सापेक्ष मानों के आधार पर ठोसों को तीन वर्गों में बाँटा जाता है :   1. धातु (Metals) :     इनकी प्रतिरोधकता बहुत कम होती है (अर्थात् चालकता बहुत अधिक होती है)।   $\rho \approx 10^{-2}/$ से $10^{-8} \Omega m$ $\sigma \approx 10^{2}$ से $10^{8} \, S m^{-1}$ 2. अर्धचालक (Semiconductors) :     इनकी प्रतिरोधकता और चालकता धातुओं और कुचालकों के बीच होती है।   $\rho \approx 10^{-5}$ से $10^{6} \, \Omega m$ $\sigma \approx 10^{5}$ से $10^{-6} \, S m^{-1}$ 3. कुचालक (Insulators) :     इन...